
पुकारती हमें धरा।
रखें मुझे हरा-हरा।।
सदैव पेड़ ही लगा।
भूचाल खास ये भगा।
तलाब को न पाटिए।
न पेड़ आज काटिए।।
विचार बात ये जरा।
रखो मुझे हरा-हरा।।
विलासिता तजो सभी।
सुभोर हो यहाँ तभी।।
विनाश से उबार लो।
सुकाज से सँवार लो।।
मिले विशेष आसरा।
रखो मुझे हरा-हरा।।
न छेड़छाड़ रे करो।
कटाव से सदा डरो।।
कली-कली खिली रहे।
सुपावनी सभी कहे।।
बढ़ा विवेक दायरा।
रखो मुझे हरा-हरा।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा
कोलकाता, लाडनूँ




