
जिंदगी के सफर में
तू भी है मुसाफिर
लेकिन तेरे पांव में
छाले पड़े हैं
हाथों में मेहनत की
गांठें हैं लेकिन
माथे पर न शिकन की
लकीरें कहीं हैं
यह फैक्ट्रियां ये मीलें
यह ऊंची ऊंची ईमारतें
तेरे ही कंधों पर खङी हैं
तूने लहु से सींचीं है फसलें
तेरे पसीने की
खुशबू है इस में
भर दिया गोदामों को
मेहनत से तूने
तेरे हिस्से में आये
चंद सिक्के
सुभाष सलूजा
रानियां सिरसा हरियाणा




