
मै मजदूर हूँ मुझे महलों की
बस्ती से क्या है, अपना पसीना
बहाकर अगणित बार धरा पर
मैने स्वर्ग बनाएं है।
दो वक्त की रोटी को भी पर्वत
पर भी चढ़ाई की,गरज मेरी ऐसी
थी की सागर से भी लड़ाई की है,
हाड से अपने पत्थर कूटते खून
बहाते रह गये है हम।
पेट के खातिर घर के खातिर
गाली बोली सह गये है,सर्दी
गर्मी, बारिश की गोह मे फंसे
महीनो,कभी धार मे बह गये है।
बाबू जी बूढ़े, माँ की दवा, लाखो
कर्जे है, बहन का अभी ब्याह है
बाकी सोचा था बच्चो के खातिर
अन्न का दाना लाएंगे साथ मिल
कर बैठकर दो-दो निवाला खाएंगे।
मेहनत और मजदूरी करके
भूखे प्यासे रह गये है हफ्तों
घर मे चूल्हे नही जले भूख
बिलखते हम सब रह गये है।
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश




