
शांत करे जो क्षुधा उदर की,
वो सारे ही मजदूर हुए । दफ्तर हो या सड़क-दुकान,
श्रम करने को मजबूर हुए ।
युवावस्था के स्वप्न भी किंचित,
दफन हुए दायित्वों में, प्रस्वेद -बिंदु मिश्रित चक्षु- कण,
साहिल संग कोहिनूर हुए ।
मैदानों पर सड़कें अनगिन और भवन मन्जूर हुए
मिलें बनाईं मीलों तक, फिर भी ना मशहूर हुए
विकसित होते देश ये जिससे, सदा रहे अभावों में
शोषण करने वाले उनके, धन-मद में मगरूर हुए
*विनीता चौरासिया*
*शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश*



