साहित्य

मजदूर: सृजन का आधार

कवयित्री ज्योति वर्णवाल

 

एक मई की इस सुबह, चलो उन्हें सलाम करें,
जो दिन-रात खटते हैं, आओ उनका सम्मान करें।

मैं चलती हूँ आज उस जुलाहे भैया के पास,
जो सूत के धागों में बुनते हैं खुशियों का अहसास।

उनकी बुनी साड़ियों में जब बेटियाँ मंडप सजाती हैं,
तो उन हाथों की मेहनत ही घर में खुशियाँ लाती हैं।

मैं चलती हूँ आज उस मोची भैया की दुकान,
जो चमड़े को रंग देकर, बढ़ाते हैं पैरों की शान।

पहन के उनके बनाए जूते, जब दूल्हा बारात सजाता है,
श्रम का वो सुंदर रूप, हर किसी को भाता है।

मैं चलती हूँ आज उस बढ़ई भैया के द्वार,
जो जंगल की लकड़ियों से, रचते हैं सुंदर संसार।

बनाते हैं वो खटिया, मेज़ और बैठने के आसन,
जहाँ बारातियों का स्वागत करती अम्मा, खिलाती हैं भोजन।

मैं चलती हूँ आज उस राजमिस्त्री के पास,
जो ईंटों और गारे से, बुनते हैं पक्का विश्वास।

वो घर बनाते हैं जहाँ, सारा परिवार साथ रहता है,
उनकी मेहनत का हर कतरा, ईंटों की दीवारों से बहता है।

इनके बिना इस दुनिया की, कल्पना भी बेमानी है,
मजदूरों के दम पर ही चलती, विकास की ये कहानी है।

शत-शत नमन उन हाथों को, जो सृजन का काम करते हैं,
मजदूर दिवस पर हम सब, उनका सम्मान करते हैं।

कवयित्री ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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