साहित्य

साधना क कसौटी

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा"

साधना क कसौटी
खरा सोना ही दहकत आग में, इ तपके चमकेला,
कसौटी पे कसल जाके, तबै खर खर इ उतरेला ।
तनिक भी खोट जे होई,तपन के सह नहीं पाई ,
कसौटी पै कसल जाके, प्रमानित हो नहीं पाई ।
न उत्तम ही इ कहलाई ,न उचहन भाव लग पाई ,
निखर सिक्कन बजारे में,इ खोटा चल नहीं पाई ।
करन-करनी सभी साधक, कसौटी साधना होला,
सफलता,साधना-साधक क परिचय भी यही देला।
तपस्या के तपन से ही , सकल विकार हर जाला ,
सुचिंतन सद् विचारन से विमल आचार बन जाला।
सहज व्यक्तित्व क धारक निरन्तर ही निखर जाला,
अँधरिया हो घना जेतना, उजाला पा उ मिट जाला।
मधुर बानी, विनय व्यवहार व आचार में निष्टा ,
मनुजता में अडिग विश्वास भी देला वही स्रष्टा।
तितिक्षा,त्याग,तप ,सेवा समरपन भाव से होला,
निखरले पे सदा साधक के,वर्चस भी यही देला।
तपस्या से ही पर- पीड़ा- शमन सामर्थ्य आवेला,
साधक साध्य बन जाला उ कुन्दन बनके चमकेला।
कसौटी पे कसल जाके तबै खर खर इ उतरेला ,
खरा सोना ही दहकत आग में इ तपके चमकेला।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा”अकिंचन” गोरखपुर
चलभाष 9305988252ः

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