
वो मेरी परछाईं है
या मैं उसकी हूँ ,
पता नहीं !
पर ,
रहती हूँ ,सदा साथ -साथ |
कभी बड़ी तो कभी छोटी
बनकर ,
या फिर ,
होकर विलीन एकदूसरे में
रहती हूँ ,सदा साथ -साथ |
आई थी बनकर,वो जीवन में
मेरे …,
परछाईं की तरह
बिखेरने को खुशियाँ सदा ,
कुसुमलता के समान ,
पर ,हो गई विलीन वह
सदा के लिए -स्याह घने अँधेरे में ,
परछाईं की तरह ,
रहती हूँ ,सदा साथ साथ ..||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब
©स्वरचित मौलिक रचना
14-06-2026




