साहित्य

बारिश की बूंदे जब 

डॉ रामशंकर चंचल

याद है उस दिन

तुम घर से निकल

आ रही थी

बस वैसे ही मिलने

बहुत दिन हो गए थे

निकलते ही तेज बारिश का

सामना करना पड़ा था

रास्ते में भीग गई थी

देखा तुम पलके झुका कर

खड़ी थीं

और घने केश से

टपकती पानी की बूंदे

तुम्हारे झुकी ईश्वरीय तुल्य

पलको पर दस्तक दे

कितनी मोहक और सुंदर

लगा रही थी

साक्षात मां सरस्वती का

रूप लिए मेरे मन ,आत्मा में

दस्तक दे सुकून दे रही थी

मैने मन ही मन तुम्हें

वंदन किया और

दूर से तुम्हारे हाथ में

तोलिया पूछने के लिए

थमा कर, में दूसरे कमरे में

चला गया ताकि तुम

इत्मीनान से पूछ लो

बस यह अद्भुत रूप

ईश्वरीय रूप, याद कर

आज भी तुम्हें

प्रणाम करता हुआ

सुख सुकून पा

सर्जन शीला हो

ऊर्जा समेटे जी लेता हूं

सदा ही तुम्हारे मां सरस्वती के

रूप को अहसास कर

जो मेरे कक्ष में लगी

भव्य मां सरस्वती की

प्रतिमा सी थीं

वह उस पल का

जीवंत सजीव रखें

तुम्हारा रूप

वंदन सत् सत्

वंदन आराध्य रूह

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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