साहित्य

परछाईं

शशि कांत श्रीवास्तव 

वो मेरी परछाईं है

या मैं उसकी हूँ ,

पता नहीं !

पर ,

रहती हूँ ,सदा साथ -साथ |

कभी बड़ी तो कभी छोटी

बनकर ,

या फिर ,

होकर विलीन एकदूसरे में

रहती हूँ ,सदा साथ -साथ |

आई थी बनकर,वो जीवन में

मेरे …,

परछाईं की तरह

बिखेरने को खुशियाँ सदा ,

कुसुमलता के समान ,

पर ,हो गई विलीन वह

सदा के लिए -स्याह घने अँधेरे में ,

परछाईं की तरह ,

रहती हूँ ,सदा साथ साथ ..||

 

शशि कांत श्रीवास्तव

डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब

©स्वरचित मौलिक रचना

14-06-2026

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