साहित्य

मतलबी

राजीव त्रिपाठी 

तन के उजले मन के काले

लोग मिले निराले निराले!!

दिल की बात नहीं करते अब

मुझको लोग चाहने वाले!!

थोड़ी आहट से डर जाते

कौन है घर पर आने वाले!!

फ़ाक़ा खाती दुनिया में अब

रोटी नहीं शराब के प्याले!!

हमको दुश्मन समझा उसने

प्रमाण दिए चाहने वाले!!

आज यहांँ फिर कहांँ होंगे

लोग हमें चाहने वाले!!

दिल का सौदा करते हैं ये

अक्सर दिल से खेलने वाले!!

दोस्ती का कोई मोल नहीं है

सभी दोस्त हैं स्वार्थ के मारे!!

किसको समझे कौन है अपने

सभी अपने हो गए बेगाने!!

मतलब की है दुनिया सारी

मतलब को दुनिया पहचाने!!

 

स्वरचित – राजीव त्रिपाठी

उदयपुर राजस्थान

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