साहित्य

सुकून

रिया राणावत 

सुकून

किया है ये ?

ना कभी मिला

ना कभी समझा

एक अलग सा नशा है ये

 

सुकून

लफ्ज़ो में नहीं

ख्वाइश में नहीं

दौलत में नहीं

एक एहसास है यही

जिससे ढूंढ रहे हैं सभी

ना उम्र के मुताबिक मिलता हैं

ना धर्म के मुताबिक

ना जात देखी इसने

ना ईमान देखा इसने

 

देख सिर्फ इंसास

जिसने किया महसूस

हर एहसास को

जिससे आता

ना कपट रखना कभी

ये अपने आप उसको मिल जाता

 

ना सुकून है उस महल में

जिसमें तुम रहते हो

ना सुकून है उस घर में

जिसमें तुम चुप चाप सहते हो

 

 

सुकून

एक अनमोल शब्द हैं

जो हर किसी को नहीं मिलता

बिना परिश्रम के

 

सुकून

एक इबादत हैं

एक चाहत हैं

एक परिश्रम हैं

एक मुस्कुराहट है

एक जुनून हैं

एक दीवानगी हैं

 

 

आंख बंद करने पर

जो प्यारा सा एहसास है

वो सुकून है

वो सुकून है!

 

सुकून की जिंदगी का

मतलब ही यही है यारो

ना हो भले लाख पैसे जेब में

पर हो होठों पर मुस्कुराहट

 

ना हो गले में हीरो का हार

पर हो अपनो का साथ

 

कौन कहता है सुकून सिर्फ इश्क़ में है

कौन कहता है सुकून सिर्फ इश्क़ में है

 

एक बार अकेले खुदको महसूस तो करो

 

 

सुकून ये हर जगह है

बस परखना तो सीखो

 

देखो उन घटाओं पर

तुम्हे सुकून नज़र आयेगा

 

देखो वो नीले आसमान को

तुम्हे सुकून नज़र आयेगा

 

देखो उस जमीन को

जहाँ तुम खड़े हो

तुम्हे सुकून नज़र आयेगा

 

देखो उन हवाओं को

महसूस करते उनको

तुम्हे सुकून नज़र आयेगा

 

बस एक बार किसी का

भूरा मत सोचो

तुम्हे सुकून नज़र आयेगा

 

 

 

सुबह की चाय की प्याली मैं

सुकून हैं,

 

सुबह की वो धूप की चिलक में आँख डाल कर एक बार देखो

सुकून हैं,

 

उठ सुबह चार बजे

तुझे सुकून नज़र आयेगा

 

देख एक बार प्यार से

उस जानवर को

जो सड़क पर खड़ा है

तुझे सुकून नज़र आयेगा

 

एक बार हो सके

तो चढ़ाई कर पहाड़ की

सुकून नज़र आयेगा

 

एक बार हो सके

तो बैठना समंदर किनारे

तुझे सुकून नज़र आयेगा

 

एक बार हो सके

तो निकलना रात में घर से बाहर

सिर्फ पैदल घूमना

तुझे सुकून नज़र आयेगा

 

हो सके तो एक बार

बैठना छत के वो किनारे पर

जहां से दिख रहा हो

पूरा शहर

तुझे सुकून नज़र आयेगा

 

 

सुकून,

मा के हाथों के खाने में हैं

पापा की फटकार में हैं

भाई बहन की लड़ाई में हैं

 

सुंदर गगन में,

उछलती लहरों में,

चहकती चिड़ियों में,

भागते बच्चों में ,

उड़ती पतंगों में,

खिलते फूलों में,

गुनगुनाई मधुमक्खियों में,

चलते पंखे में,

जलते बल्ब में,

बर्तनों की आवाज में ,

पायल की छनछन में,

घुंघरुओं की खनखन में,

गाड़ियों के चलने में,

सब्जियों के बाजार में ,

 

सब ,

हां सबमे ,

सुकून हैं

बस ढूंढने की देर हैं

 

सुकून

हां सुकून

 

जब सोचती हूँ

इस सुकून के बारे में

तो सिर्फ मुस्कुरा देती हूँ

 

एक अलग सा एहसास महसूस होता हैं

वो एहसास

जो भुलाये नहीं जाता

वो एहसास

जिससे बार बार महसूस करने को दिल चाहता हैं

 

वो हर छोटी से छोटी खुशी में आपको सुकून मिल जाता हैं

 

पर जाने की

ये इंसान सुकून ढूंढने

दुकानों पर जाता हैं?

 

पर जाने की

ये इंसान सुकून ढूंढने

दुकानों पर जाता हैं?

 

– रिया राणावत

कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!