साहित्य

दोहे मजदूर

डॉ ऋतु अग्रवाल

सुबह सवेरे जाग कर,रोटी बाँधे चार।
नमक प्याज है साथ में,प्रभु का है उपकार।।

पीछे बच्चे छोड़कर,निकल गये नर-नार।
मंशा इतनी सी रही,पले सकल परिवार।।

तसला गारा ईंट का,उस पर तपती धूप।
श्रम करते दिनभर तभी,दिखता माया रूप।।

स्वेद टपकता भाल से,चमड़ी होती स्याह।
खून बहे या घाव हो,निकले तनिक न आह।।

इतने पर भी सांझ को, नहीं मजूरी पूर्ण।
काट-पीट वेतन मिले,होते सपने चूर्ण।।

नैनों में आँसू भरे,मुख पर है मुस्कान।
इमारतें ऊँची खड़ी,रौंदें इनका मान।।

लिखा-पढ़ी के बाद भी,शोषण है भरपूर।
शिक्षा के अवसर नहीं,आजादी है दूर।।

समानता अवसर कहाँ,कौन दिलाए न्याय।
एक दिवस मजदूर पर,चिंतक करते हाय।।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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