
गुरू रूप जग पूजता, महिमा बड़ी महान।
ब्रह्म सूत्र वेदांत से, बनी जगत पहचान।।
पाराशर ऋषि थे पिता,सत्यवती के लाल।
चार वेद को बाँट कर,तुमने किया कमाल।।
मास आषाढ़ पूर्णिमा, वेदव्यास के नाम।
धर्म कर्म का मर्म ही, बतलाना था काम।।
यमुना तट पर जन्म ले,दीप जलाया कर्म।
तुमने रचा पुराण है, बात लिखी सब धर्म।।
नाम तुम्हारे ही मने, गुरु पूर्णिमा पर्व।
तीन लोक नित ही करें, वेद व्यास पर गर्व।।
चमके दिव्य ललाट है,सदा सहजता भान।
गणपति को लेखक बना, लिखवाए सब ज्ञान।।
भगवद्गीता में भरे, पुण्य सलिल रस धार।
सारे जग में बह रही, पान मोक्ष का द्वार।।
ऐसे गुरुवर को नमन, करती बारंबार।
जिसने समझाया हमें, दिव्य ज्ञान का सार।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता




