
नहीं पता मेरा तुमसे
कैसा ये रिश्ता हैं
यूं लगता हैं बरसों पुराना रिश्ता हैं
हैं एक अनजानी सी डोर
जो खींचें ले जाती हैं तुम्हारी ओर
तुमसे मिलकर इतना जाना
हैं जन्मों का साथ ये अपना
मेरे हर एहसास में शामिल तुम होते हैं
दूर होकर भी हमेशा आस-पास ही महसूस होते हैं
तुम मेरे जिंदगी का वो हिस्सा हो
कोई खुशी हो या गम हो
तुम ही तुम याद आते हो
तुम्हारी यादों की महक में
खुद को भुलाए रखती हूं
क्या कहूं मैं तुमसे तुम्हें
कितना करीब महसूस करती हूं
हर दिन का यही फसाना हैं
दूर होकर भी हर दिन हर पल
तुम्हीं में मिल जाना हैं।
स्वरचित मौलिक रचना
तृषा सिंह
देवघर झारखंड




