
चुनाव नजदीक आते ही बड़े नेताजी से चुनाव लड़ने वाले संपर्क साधने लगे। अपने क्षेत्र में जनता की सेवा करने में जी जान से लग गये। कुछ ने तो भाड़े का भीड़ दिखाकर नेताजी को उल्लू बनाकर टिकट लेने की जुगत लगाने लगे।
नेताजी ने घोषणा की, जो अपने क्षेत्र में जनता की सेवा खूब किया है। जनता सबसे ज्यादा जिसका सपोर्ट करेगी। टिकट उसी को मिलेगा। सारे लोग नेताजी के दरबार में हाजिर हुए। सारे लोगों ने अपने-अपने तारीफ में पूल बांधने लगे।
एक ने अपनी तारीफ की। जनता की सेवा करने में अपना तन-मन जनता के घर गिरवी रख दिया हूँ। उन्हीं की सेवा करने में मैं इतना दुबला-पतला हो गया हूँ। जनता की सेवा करना धर्म हमारा है। टिकट हमको मिलना चाहिए नेताजी।
अगले ने अपनी करुण कहानी सुनाई। हमने जनता के बीच में रात दिन गुजारी है। यहाँ तक कि अपने घर की रोटी तक नहीं खाई। जनता की ही रोटी खाकर गुजारा कर रहा हूँ। दिन को न दिन समझा और रात को न रात समझा। सच्चा समाजसेवी हूँ मैं नेताजी।।
एक-एक करके लोगों ने अपनी प्रशंसा खूब की। सबने जनता की सेवा खूब की है। कहकर टिकट की पैरवी खूब की। नेताजी ने कहा–सब की समीक्षा की जायेगी। जो समाज सेवा में अव्वल दर्जे का किया होगा। उसी को टिकट मिलेगा।
अगले दिन अखबारों की सुर्खियाँ बन गयी कि टिकट मुरारीलाल को मिल गया। जनता तथा चुनाव में तैयारी करने वालों में चर्चा है कि मुरारीलाल तो कभी जनता के बीच में गया ही नहीं। कैसे टिकट मिल गया?
राजनीति के कच्चे खिलाड़ियों! जनता की नहीं नेताजी की सेवा मुरारीलाल ने की। मुरारीलाल ने एक थैला पैसा नेताजी के चरणों में समर्पित कर दिया। अरे मूर्खो! टिकट जनता की नहीं नेताजी की सेवा करने से मिलता है।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




