
एक औरत को औरत पर लांछन लगाते,
आती नहीं है शर्म क्या इस तरह इतराते।
क्या हो सोचती कि मान मिलेगा तुमको?
जो नहीं जानता है देना मान, वो हकदार हो सकता नहीं है मान का।
किसी को अबला समझने की भूल मत करना,
चिंगारी भड़क कब शोला बन जाए,
ये जानना है बड़ा मुश्किल।
दहकते ज्वालामुखी को है रोकना मुश्किल।
आहुति देना आसान बड़ा है।
उच्चरित भावाग्नि को दबाना मुश्किल।
औरत हो औरत का सम्मान करो,
लांछन देकर स्व को लाञ्छित मत कराओ।
सीधा सा नियम है जो दिया है वही मिलेगा।
जो बोया है वही उगेगा, वही काटोगे।
रचयिता –
सुषमा श्रीवास्तव ,
मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, ©®,रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




