साहित्य

कभी हंसाता तो कभी रुलाता है

संगीता वर्मा

जीवन का खेल समझ नही

आता,

कभी धूप है, कभी है छांव,

अजब निराला है यह गांव।

 

समझ न आए इसकी रीत,

कहाँ हार है, कहाँ है जीत?

कभी मिलते हैं खुशियों के मेले,

कभी खड़े होते हैं हम अकेले।

 

पाते हैं जो, वो खो जाता है,

जो खोया, वो याद आता है।

कभी हँसती है ये दुनिया सारी,

कभी आँखों में होती है लाली।

 

हर पल बदलता है ये मौसम,

कभी हँसी, कभी है ये गम।

चलता है ये कैसा जुआ,

कोई सुलझा न पाया इसको हुआ।

 

सब अपनी-अपनी चालें चलें,

जाने किस राह पर हम निकलें।

न कोई आदि, न कोई है अंत,

पल-पल बदलता है ये रंग।

 

समझ न आए फिर भी प्यारे,

इसी खेल के हम हैं खिलाड़ी सारे।

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स्वरचित एवं मौलिक रचना✍️

संगीता वर्मा,कानपुर उत्तर प्रदेश

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