साहित्य

मोबाइल नहीं कोमल मन दो

सरोज शर्मा

विनम्र  आग्रह   माताओं  से,

बेटियों में कुछ संस्कार भरें ।

किसी मात का लाल न छीनें,

यूं न किसी  के भी प्राण हरें

 

पड़ी  प्रेम  त्रिकोण संकट में,

बढ़ी  दुविधा  फिर मन भारी ।

स्वार्थ और  उन्माद  में भूली,

प्राण हनन की करी तैयारी ।

 

मात- पिता को कुछ न बताया

प्रेमी  संग मिल जाल बिछाया ।

हुई  सोच  विकृति,  नासमझी

किसी घर का चिराग बुझाया ।

 

जिस  माँ ने  नौ माह  गर्भ में,

बूंद -बूंद  रक्त से सींचा होगा ।

उस लाल की  बलि  चढ़ा दी,

माँ का  दर्द  ना  सोचा  होगा ।

 

सुनो ! माताओं  हंताओं को

कुछ तो अच्छी सूझ-बूझ दो।

कुसंगति   से    इन्हें    उबारो

मोबाइल नहीं,कोमल मन दो ।

 

सरोज शर्मा

दिल्ली

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