
विनम्र आग्रह माताओं से,
बेटियों में कुछ संस्कार भरें ।
किसी मात का लाल न छीनें,
यूं न किसी के भी प्राण हरें
पड़ी प्रेम त्रिकोण संकट में,
बढ़ी दुविधा फिर मन भारी ।
स्वार्थ और उन्माद में भूली,
प्राण हनन की करी तैयारी ।
मात- पिता को कुछ न बताया
प्रेमी संग मिल जाल बिछाया ।
हुई सोच विकृति, नासमझी
किसी घर का चिराग बुझाया ।
जिस माँ ने नौ माह गर्भ में,
बूंद -बूंद रक्त से सींचा होगा ।
उस लाल की बलि चढ़ा दी,
माँ का दर्द ना सोचा होगा ।
सुनो ! माताओं हंताओं को
कुछ तो अच्छी सूझ-बूझ दो।
कुसंगति से इन्हें उबारो
मोबाइल नहीं,कोमल मन दो ।
सरोज शर्मा
दिल्ली




