साहित्य

जब आँगन अनाथ हो जाते हैं

दिनेश पाल सिंह

कभी-कभी लगता है कि घर ईंट, पत्थर और सीमेंट से नहीं बनते। वे दादी की खाँसी, माँ की पुकार, पिता की डाँट, चाचा की हँसी, चाची के स्नेह, भाई-बहनों की शरारत और आँगन में खड़े उस बूढ़े बरगद की छाया से बनते हैं। जब ये सब एक-एक करके चले जाते हैं, तब घर नहीं उजड़ता—जीवन उजड़ जाता है।

हमने विकास की दौड़ में बहुत कुछ पाया है। ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमकते बाज़ार और आधुनिक सुविधाएँ। लेकिन इस चमक के बदले हमने जो खोया है, उसका हिसाब किसी अर्थशास्त्र की किताब में नहीं मिलता।

गाँव का वह विशाल आँगन, जहाँ सुबह सबसे पहले तुलसी पर जल चढ़ता था, आज बंद दरवाज़ों के पीछे धूल ओढ़े पड़ा है। कभी उसी आँगन में दादी रामायण गाती थीं, पिता खेतों की बातें करते थे, चाचा हुक्का गुड़गुड़ाते थे और बच्चे बरगद की जटाओं से झूला बनाकर आसमान छूने का सपना देखते थे।

फिर समय ने धीरे-धीरे सब बदल दिया।

रोज़गार की तलाश में बेटे शहर चले गए। बेटियाँ अपने-अपने घरों की हो गईं। बड़े भाई और भाभी भी महानगर की भागदौड़ में बस गए। गाँव का घर ताले में कैद हो गया। पीछे छूट गए केवल बुज़ुर्ग, तुलसी का सूखता चौरा और वह बरगद, जो वर्षों तक पूरे परिवार का मौन प्रहरी बना खड़ा रहा।

कितनी विचित्र बात है! जिस बरगद ने तीन-तीन पीढ़ियों को धूप से बचाया, उसकी जड़ों तक अब कोई लोटा जल नहीं पहुँचता। जिस तुलसी के सामने हर संध्या दीपक जलता था, वहाँ अब केवल सूखे पत्ते उड़ते हैं। जिन दीवारों ने रिश्तों की हँसी सुनी थी, वे अब सन्नाटे की भाषा सीख चुकी हैं।

हम कहते हैं कि माता-पिता अकेले हो गए हैं। पर क्या कभी सोचा कि घर भी अकेले हो जाते हैं? आँगन भी प्रतीक्षा करते हैं। तुलसी भी किसी अपने के स्पर्श को तरसती है। बरगद भी अपने बच्चों की आहट पहचानता है।

हम शहरों में सुंदर फ्लैट बना लेते हैं, पर उनमें वह आकाश नहीं होता जहाँ गौरैया घोंसला बनाती थी। वहाँ वह मिट्टी नहीं होती जिसकी सौंधी खुशबू मानसून की पहली वर्षा में आत्मा तक उतर जाती थी। वहाँ वह बरगद नहीं होता जिसके नीचे बैठकर जीवन की सबसे बड़ी समस्याएँ भी छोटी लगने लगती थीं।

आज हमारे बच्चे वातानुकूलित कमरों में बड़े हो रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी दादी की गोद में कहानी नहीं सुनी, न बरगद की छाँव में दोपहर बिताई और न तुलसी के चौरे पर दीप जलाने का सुख जाना। वे तकनीक से जुड़े हैं, पर अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं।

सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं कि गाँव खाली हो रहे हैं। सबसे बड़ा दुःख यह है कि स्मृतियाँ भी बेघर हो रही हैं।

शायद आने वाली पीढ़ियाँ यह भी न जान पाएँ कि किसी समय घर के सबसे बड़े सदस्य केवल दादा-दादी ही नहीं, बल्कि आँगन का बरगद और चौरे की तुलसी भी हुआ करते थे।

जब परिवार बिखरता है तो केवल लोग अलग नहीं होते। उनके साथ घर की आत्मा भी बिखर जाती है। रिश्तों की जड़ें सूखने लगती हैं और एक दिन पूरा आँगन अनाथ हो जाता है।

इसलिए यदि अभी भी कहीं आपका पैतृक घर खड़ा है, यदि वहाँ कोई बूढ़ा पेड़ अब भी आपकी राह देख रहा है, यदि तुलसी का चौरा अब भी आपकी प्रतीक्षा कर रहा है, तो लौट जाइए—भले एक दिन के लिए ही सही। क्योंकि कुछ रिश्ते फ़ोन पर नहीं निभते, उन्हें छूना पड़ता है।

हो सकता है, आपके लौटने से वह बरगद फिर से हरा न हो, लेकिन उसके सूखे तने में यह विश्वास अवश्य लौट आएगा कि उसका परिवार अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

 

सूखे पेड़ ने चुप रहकर, जीवन का संदेश दिया,

रिश्तों को सींचो, वरना हर आँगन एक दिन वीरान होगा।

घर केवल दीवारों से नहीं, अपनों के स्नेह से बसता है,

प्रेम बचेगा तो ही आने वाला कल महान होगा।

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

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