
आ गयी ग्रीष्म ऋतु
कोयल की कूक, गुंजार हुआ
वन-उपवन घर आँगन,
आम्र वृक्ष पर आ गया बौर
गंध से महक गया जहाँ।
बहने लगा,तन से पसीना
नदियों की चाल निराली,
प्यासे हुये जीव जगत के
हर जगह पानी खोजते।
धैर्य रखो गर्मी सहन कर लो
सब यही कहते
सूर्य बन गया अंगारा,
सुबह होते ही दोपहर का एहसास हो रहा।
ऐ.सी.-कूलर-फ्रिज चल पड़े
लस्सी-कुल्फी-दही-रायता,
छाज-बर्फ सब ठंडी चीजें खा रहे
बार-बार बहुत गर्मी है कह रहे।
मौसम बदला,
खीरा-ककड़ी-आम खा रहे
खरबूजे की महक से भरा घर
नारियल पानी-गन्ने का जूस सब पी रहे।
पक्षी बार-बार चोंच खोल रहे
कैसे पीये पानी,पानी रखा गर्म हुआ
जल रहा धरती का कण कण
शीतलता गायब हुई।
चल रही सूर्य की तानाशाही
दोपहर का सन्नाटा छा गया,
जीव-जन्तु व्याकुल हुये
पक्षी पेड़ों की छाँव लिये।
सूखी हवाएं दे रही संदेश
संघर्ष के बाद हर सुख मिलता,
बनते और मजबूत तन-मन
जीवन एक नया पाठ पढ़ता।
यह तपन सिखाती जीवन का सार
हर कठिनाई में छुपा है उपहार,
है यह भी जीवन की साधना
आती जब रिमझिम फुआर
सुकून सांसों को मिलता।
स्वरचित
डॉ. प्रभा जै “श्री ”
देहरादून




