
वो अजनबी
जिंदगी की भाग-दौड़ से थककर या हारकर आज मैंने घर छोड़ दिया था।भाग जाना चाहती थी इस घर से इस समाज से और शायद इस जिंदगी से भी ।
मैंने घर से कुछ नहीं उठाया था । क्योंकि जिंदगी जीने की इच्छा ही नहीं थी ।हर तरफ से सुनने वाली बातें और अनगिनत नाकामियों ने मुझे तोड़ दिया था ।
और इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी का बोझ कम करने के लिए अपने ही जीले से बहती नदी के किनारे कब पहुंच गई पता ही नहीं चला।बस कदम बढ़ते जा रहे थे।
और,होश आया तो जिंदगी और मौत में कुछ मिनट का फासला था ।और,मेरा फैसला अडिग..!
मैंने कूदने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाया तब ही पीछे से एक आवाज आई -” थोड़ा उस तरफ से कूदो।यहां से बचने के चान्सीज है ।
मैंने पलट कर नहीं देखा ।
वो फिर सधी हुई आवाज में बोलते हुए -” बताओ पिक्चर देखने की उम्र में खुद पिक्चर बनने जा रही हो।
मुझे गुस्सा तो बहुत आ रहा था कि मैं उसकी बातें सुन ही क्यों रही हूँ।
मैं खुद को आगे की तरफ धकेलने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी वह फिर से -“यहाँ से मत कूदो, सच कह रहा हूँ… बच जाओगी,और फिर उसके बाद तो और भी दुर्गति होगी,
क्योंकि हाथ-पैर तो तुम्हारे टूट ही जाएँगे।”
अब मुझे उसके ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था।
मैंने पलट कर उसे देखा।उसकी उम्र मुझसे थोड़ी ज़्यादा रही होगी।पर उसकी पर्सनालिटी बहुत अच्छी थी।मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा,
और तभी वह मुस्कुराते हुए एक कैमरा निकालकर मेरी फोटो क्लिक करने लगा।
और, मैं गुस्से में उसकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए -“बेवकूफ़ इंसान!”
तभी वह हंसते हुए -“अरे, शुक्र करो कि मैं तुम्हारी ऐसी फोटो खींच रहा हूँ,वरना तो तुम्हारा पता भी नहीं चलता।”
मैं गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए -“तो मुझे कौन सा किसी को बताना है?”
इतने में ही मैं उसकी तरफ चार कदम बढ़ा चुकी थी,
और वह अपने चार कदम पीछे की ओर ले चुका था।
बहस करते-करते कब मैं नदी के ऊपर बने पुल पर आ गई,मुझे खुद भी पता नहीं चला।
तभी उसने सामने से आती हुई गाड़ी की तरफ देखा,और मुझे झटके से अपनी तरफ खींच लिया।
और,वह मेरी आँखों में देखते हुए संजीदगी से -“क्यों मरना चाहती हो तुम?
जिंदगी तो बहुत खूबसूरत है।”
मैं गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए -“तुम्हें क्या करना?”
फिर वो शांत स्वर में बोलते हुए -“नहीं… मैं जानना चाहता हूँ,क्योंकि तुम्हारे ऊपर तो अभी कोई ज़िम्मेदारियाँ भी नहीं हैं।”
मैं उसकी तरफ देखते हुए टूटे हुए स्वर में बोलते हुए –
“मेरी जिंदगी की किसी को जरूरत नहीं है।
मैं नाकाम हूँ।मेरे अंदर कोई खूबियाँ नहीं हैं।मैं कमियों का भंडार हूँ।
मुझे कुछ नहीं आता -सुबह की चाय बनाने से लेकर रात के खाने तक,मेरा कोई काम ठीक नहीं होता।
ना ही किसी को कुछ पसंद आता है।”
और,घरवाले भी शायद मेरी शादी करके अपना पीछा छुड़ाना चाहते थे।सच में…
अब तो ,मेरी ज़िंदगी सबके लिए बोझ बन चुकी थी ?
जिसे देखो, मुझमें कमियाँ ही ढूँढ लेता है।
तभी वो अजनबी हल्का सा हँसते हुए -“सच में, तुम्हारी ज़िंदगी में तो बहुत परेशानियाँ लगती हैं।लगती तो तुम पढ़ी-लिखी हो।”
मैं उसकी तरफ देखकर हल्का सा मुस्कुराते हुए -“हाँ, मैं पी.एच.डी. कर रही हूँ।
कुछ वक्त बाद मेरे नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लग जाएगा।
पर… मैं फिर भी नाकाम हूँ।”
वो अजनबी मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया और हंसकर –
“अच्छा… तो फिर, नमस्ते डॉक्टर साहिबा!”
और उसकी वो बात सुनकर मैं अनायास ही हँस पड़ी।
वो अजनबी कुछ देर तक मुझे चुपचाप देखता रहा।उसकी आँखों में अब मज़ाक नहीं,बल्कि एक अजीब सी गंभीरता थी।
वो धीमी आवाज में-“जानती हो, लोग नाकाम तब नहीं होते जब वो गिरते हैं…बल्कि तब होते हैं जब वो खुद को बेकार मान लेते हैं।”
मैं चुप रही।
उसने फिर कहा -“तुम खुद को कमज़ोर समझती हो,
पर जो लड़की अपने परिवार के लिए सुबह से रात तक काम करे,पढ़ाई भी करे,और फिर भी मुस्कुरा ले…
वो नाकाम नहीं,बहुत मज़बूत होती है।”
मेरी आँखें भर आईं।
और मैं उसकी तरफ देखते हुए -“पर किसी को मेरी परवाह नहीं…”
वो मुस्कुराकर -“गलत।तुम्हें खुद की परवाह नहीं।
और जब तक इंसान खुद से प्यार नहीं करता,दुनिया का प्यार भी अधूरा लगता है।”
मैं उसकी बात सुनती रही।उसने अपने बैग से एक छोटी सी डायरी निकाली,और मेरी तरफ बढ़ाते हुए- “ये मेरी बहन की डायरी है।
वो भी खुद को बोझ समझती थी…और एक दिन सच में हमें छोड़कर चली गई।काश, वो एक बार खुद को समझ पाती।”
मेरे हाथ काँप गए।
और ,वो भर्राई आवाज में -“तुम वैसी गलती मत करना।
तुम्हारे सपने अभी ज़िंदा हैं।तुम्हारे नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगेगा -और उसी दिन,तुम्हारे घरवालों को तुम्हारी असली क़ीमत समझ आएगी।”
मैंने धीरे से पूछा -“अगर तब भी उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं हुई तो?”
वो हँस पड़ा और मेरी तरफ देखते हुए -“तो फिर पूरी दुनिया को तुम्हारी ज़रूरत होगी,डॉक्टर साहिबा।”
मैं भी हल्का सा मुस्कुरा दी।
उसने आसमान की तरफ देखा और धीमी आवाज में –
“ज़िंदगी का एक ही नियम है -जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है।”
और उसी पल,मुझे पहली बार लगा कि शायद मैं सच में…बोझ नहीं हूँ।
तभी वह अजनबी मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखकर बोला
“क्या, कुछ देर बैठकर यहाँ किनारे पर बातें कर सकते हैं?”
शायद मैं अपनी सारी परेशानियाँ उस पल भूल चुकी थी।
मैंने सिर हिला कर उसकी तरफ संकेत किया।
वह चलते हुए -“तुम्हारा नाम क्या है?”
मैं उसकी तरफ देखती रही।
शायद मुझे खुद अपना नाम भी याद नहीं था,क्योंकि इतने सालों से घर में किसी ने मेरा नाम लिया ही नहीं था…
बस “छोटी” कहकर बुलाते रहे।
मैं हँस पड़ी।
वह अजनबी मुस्कुराते हुए -“अरे भई, डॉक्यूमेंट में तो कुछ नाम होगा ना?”
मैं मुस्कुरा कर -“लावण्या।”
वह अजनबी मुस्कुराकर मेरी तरफ देखते हुए-“और मैं… आदित्य।”
लावण्या मुस्कुराकर आदित्य की तरफ देखते हुए-“तुम यहाँ क्या कर रहे थे?”
आदित्य गहरी साँस लेते हुए-“मैं भी यहाँ थका-हारा, ज़िंदगी से खुद को आज़ाद करने आया था।
पर फिर सोचा…ऐसी आज़ादी का क्या फायदा,जो हमारे अपने लोगों के लिए अनगिनत सवाल छोड़ जाए?
और जिनका जवाब देते-देते,हमारे माता-पिता की आँखों में सिर्फ आँसू ही रह जाएँ।
और वह मेरी तरफ देखते हुए -“सच कहूँ,हम अपनी नाकामियों के लिए खुद ज़िम्मेदार होते हैं।अगर हमारे अंदर कमियाँ हैं,तो उनकी वजह भी हम ही होते हैं।
हम चाहें तो क्या नहीं कर सकते?नाकामियों को खूबियों में बदल सकते हैं,हार को जीत में बदल सकते हैं…
और जो भी कमियाँ हैं,वो कब दूर हो जाएँगी, पता भी नहीं चलेगा।”
लावण्या मुस्कुराकर आदित्य की तरफ देखते हुए -“बात तो तुम सही कह रहे हो,पर लोग हमारी खूबियाँ को क्यों नहीं देखते?
हमेशा हमारी कमियों पर ही दोष क्यों लगाते हैं?”
आदित्य मुस्कुराकर -“लोगों का काम ही है, हमें हमारी कमियाँ गिनवाना।पर ये हमारे बस में है!कि हम उन पर कितना ध्यान देते हैं और कितना नहीं।
मानती हो ना?”
लावण्या ज़ोर से हँसते हुए बोली -“हाँ, बिल्कुल!
और शायद अब मुझे समझ आ गया है कि मुझे क्या करना है।”
आदित्य मज़ाक में मुस्कुराते हुए -“तो क्या मैं तुम्हें ज़ोर से धक्का दे दूँ?”
लावण्या तुरंत आंखें बड़ी करते हुए -“नहीं!”
“अब मुझे ज़िंदगी से आज़ादी नहीं चाहिए।
मुझे अपनी सोच, अपनी नाकामियों और अपनी हार से आज़ादी चाहिए !और वो मैं बहुत जल्दी लेकर रहूँगी।”
आदित्य उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए -“मुझे बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलकर।
और वह कुछ पल रूककर लावण्या की तरफ देखते हुए -सच कहूँ,इस वक्त मुझे भी किसी ऐसे की ज़रूरत थी
जिससे मैं अपने दिल की बात कह सकूँ।”
लावण्या हल्की मुस्कान के साथ-“शायद मुझे भी…”
आदित्य कुछ सोचकर -“तो क्या हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं?”
लावण्या सिर हिलाते हुए -“हाँ।क्योंकि जो बातें मैंने तुमसे दिल खोलकर कही हैं,वो शायद मैं अपने घर में भी नहीं कह पाती।वहाँ सब मुझे जज करते हैं,समझता कोई भी नहीं…और तुमने मुझे दो ही मिनट में समझ लिया।”
आदित्य मुस्कुराते हुए -“क्योंकि मैं तुम्हारा कोई रिश्तेदार नहीं हूँ,ना ही घर का कोई सदस्य।शायद इसलिए तुम खुलकर बोल पाईं।”
लावण्या मुस्कुराकर आदित्य की तरफ देखकर -“हाँ…
क्योंकि अजनबी दोस्त ही वो होता है,जो सही राह दिखाता है।”
मैंने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।और उसी पल, मुझे लगा कि शायद अब मैं अपनी नाकामियों और डर से आज़ाद होने की राह पर हूँ।
और,हम दोनों ने एक गहरी सांस ली।और एक नई शुरुआत का वादा कर,अपने-अपने रास्ते लौट आए —
अपनी सफलता हासिल करने के लिए।”
कीर्ति त्यागी
फरीदाबाद, हरियाणा




