
साहित्य के गगनांगन में एक दैदीप्यमान नक्षत्र जिसने साहित्य को आलोकित कर ज्ञान की किरणों को पाठकों के बीच पहुँचाया। इनका नाम था- नृपेन्द्रनाथ गुप्त। इन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अहम योगदान दिया ,जो सदैव अविस्मरणीय रहेगा। इनका जन्म 01 सितम्बर, 1934 ई0 को बिहार राज्य के मुंगेर जिलान्तर्गत माधोपुर गाँव में हुआ था। पिता श्री उदित नारायण लाल एवं माता मैना देवी के अनमोल रत्न नृपेन्द्रनाथ गुप्त थे। इन्होंने साहित्य की अहर्निश सेवा कर उसे गौरवान्वित किया। गुप्त जी शैशवास्था में ही मातृ-प्यार से वंचित हो गए थे। ये पिता की छत्र-छाया में स्नेह, दया और संघर्ष पाकर सफल साहित्यकार बने और समाज व राष्ट्र की सेवा की। इनकी प्राथमिक शिक्षा 1946 में मुंगेर के नगरपालिका विद्यालय में हुई। पुनः माध्यमिक शिक्षा 1951 में टाउन स्कूल, मुंगेर से हुई। पुनः उच्च शिक्षा 1955 में आर०डी० एंड डी0जे0 कॉलेज, मुंगेर और तत्पश्चात् 1959 में पटना विश्वविद्यालय से हुई।
नृपेन्द्रनाथ गुप्त विद्यालयी छात्र जीवन से ही साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ते-लिखते रहते थे। इन पर सर्वाधिक साहित्यिक प्रभाव प्रेमचंद की यथार्थवादी कहानियों का पड़ा। उन्होंने बालसेवा दल, हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन किया। तत्पश्चात् 15 अगस्त 1958 में मुंगेर में स्वर्गीय प्रताप नारायण सिंह के आवास पर सहपाठियों सहयोगियों के साथ मिलकर बालसेवा-दल पुस्तकालय की स्थापना की। गुप्त जी के द्वारा पत्रिका एवं पुस्तकालय को जनकल्याणकारी देखकर भूतकालीन उपमुख्यमंत्री डॉ० अनुग्रह नारायण सिंह और कवि-कथाकार नागार्जुन ने सहायता की। इनसे परिचय ठाकुर श्रीनाथ सिंह के सम्पादन में 1949 में इलाहाबाद से प्रकाशित बाल-बोध पत्रिका से हुआ। ये सक्रिय एवं कर्मठ होकर इस पत्रिका से जुड़ गए तथा रचनाएँ सृजित करने लगे। जब गुप्त जी मैट्रिक के छात्र थे। ये उस समय इस राष्ट्रीय स्तरीय पत्रिका के सम्पादक मंडल के पाँच मेधावी छात्रों में चयनित हुए। इन्होंने अपने महाविद्यालय से साहित्यिक गतिविधि निरंतर जारी रखा। जब आप पटना विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पढ़ाई के क्रम में



