साहित्य

भटकती आत्माएं 

मधु वशिष्ठ

‍समझ नहीं आता

हाड़ मांस के पिंड से आगे

उन्हें क्यों नहीं दिख पाता?

 

बहुत सी डिग्रियां

वाणी में माधुर्य

बुद्धि में चातुर्य।

कोई उन्हें क्यों नहीं समझा पाता

मानवता का पाठ ही मानव क्यों भूल जाता?

 

अपनी माता के गोद में क्या वह सोया नहीं होगा?

अपनी पुत्री में भी उसे मां का रूप क्यों नहीं दिखा होगा?

 

क्रूर वीभत्स क्रीड़ा करते हुए उनकी आत्मा पर जोर क्या पड़ा नहीं होगा?

 

कुछ आत्माएं धरती पर जीवित भी भटकती है।

वह क्रूरता की कोई भी सीमा पार कर सकती हैं।

 

धरती के नियम उन्हें समझ कहां आते हैं?

उनके लिए कहां कोई रिश्ते नाते हैं?

 

मांस पिंड से घूम रहे

मांस पिंड की तलाश में।

उनकी जीवित आत्मा की शांति के लिए कोई यज्ञ क्यों नहीं करवाते हैं?

 

उन भटकती आत्माओं में कोई मानवता का संचार क्यों नहीं कर पाते हैं?

 

अब इस धरती पर एक डाकू को ऋषि बनाने के लिए कोई महापुरुष क्यों नहीं आता?

भटकती मृतप्राय: जीवित आत्माओं को कोई पुनर्जीवन क्यों नहीं दे पाता?

 

कोई जादूगर उनके कठोर मन को कोमल क्यों नहीं कर पाता?

वह रह कर मन में बस यही ख्याल है आता।

 

यदि यह भटकती जीवित आत्माएं भी मानव में परिवर्तित हो जाती तो यह जीवन कितना सुंदर हो जाता।

 

मानव का मानव से ही डर खत्म हो जाता।

इस संसार सागर में सबका आना मधु सफल ना हो जाता।

 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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