
प्यार का गुलशन बसाना छोड़ दूँ
क्यों मैं इस महफिल में आना छोड़ दूँ
आपको भाती नहीं मेरी तरबियत,
तो क्या बच्चों को पढाना छोड़ दूँ
बज़्म मे आकर तू बस एकबार कह दे,
मैं तुझे अपना बताना छोड़ दूँ
चाकू महंगाई गले पर धर खड़ी
जी करे बाजार जाना छोड़ दूँ
बात भी दुश्मन जो कर ले प्यार से,
दुश्मनी मैं भी निभाना छोड़ दूँ।
रिश्ते हैं जीवन के संचित रत्न से,
कैसे मैं अनुपम खजाना छोड़ दूँ।
मेरे पुरखों की यहाँ हैं निशानियाँ,
मत कहो कि गाँव आना छोड़ दूँ
संगीता श्रीवास्त शिवपुरी



