साहित्य

मन

डॉ. दक्षा

मन एक नदिया, बहती जाए,

कोई भी इसको बाँध न पाए।

कभी लहर ये शांत हो जाए,

कभी भंवर में आग लगाए।

मन ही सागर, मन ही प्यासा,

मन धड़कन, मन ही आशा।

कभी हँसाए, कभी रुलाए,

दुनिया भर के रंग दिखाए।

भीतर इसके द्वंद्व पुराना,

अक़्सर ख़ुद से ही टकराना।

मौन में जो स्वर सुन पाए,

वही स्वयं को अर्थ बताए।

जो मन को कर ले निस्पृह,

उसके लिए सब सहज-सुगम।

मन ही तो है आदि और अंत,

मन में ही है शांति का वसंत।

 

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद,गुजरात।

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