
गरज-गरज कर बरसो वारिद,
धरती प्यास बुझा जाओ।
रोम रोम में अगन लगी है,
अंतस तक शीतल कर जाओ।
बाट जोहती धरा तुम्हारी,
रिमझिम मेघ बरसा जाओ।
सूखे पड़े ताल-तलैया,
जलधि में उफ़ान लाओ।
अपनी रसभीनी फुहार से,
तन-मन मस्तिष्क भिगो जाओ।
आ जाओ,आ जाओ हे मेघराज तुम आ जाओ,
आकर आसमान में तुम अपनी कृपा बरसा जाओ।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, ©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



