
दानवता का तांडव देखा मानवता शर्मसार हुई,
चीख चीख कर अंबर रोया, धरती भी बेज़ार हुई।
मासूमियत को कुचल दिया और कैसा यह अंधियारा है,
बचपन की वो खिलती दुनियां जुल्मों का शिकार हुई।
तेरह वर्ष की उस गुड़िया की, चीखें कोई ना सुन सका,
इंसाफ की राह थमी रही, हर सांस यहां लाचार हुई।
काँप उठी है रूह सभी की, पत्थर भी अब रोते हैं,
उस नन्ही सी जान के आगे ये दुनिया गुनाहकर हुई।
जालिमों के इन सायों से, हर आंगन अब डरता है,
सच्चाई की साख बचाने, हर आंख आज बेदार हुई।
सूरज को अब उगना होगा, इन जुल्म का अंत करने को,
तब कहेंगे दुनिया बदली, जब बेटी सुरक्षित हर बार हुई।
हैवानियत के इस मंजर पर हरदिल आज दहलता है,
मासूम की खुशियां छीन ली ऐसी ये तकरार हुई।
अब और ना सहना जुल्म हमें, आवाज उठाना लालजिम है,
“आकाश” लिखेगा नया सवेरा, जब बेटी की जय जयकार हुई।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




