बिहार

स्वस्थ समाज रचना में साहित्यकारों की भूमिका : आचार्यकुल का दृष्टिकोण

पटना/बोधगया। आचार्य विनोबा भावे की विचारधारा से प्रेरित आचार्यकुल आज के समय में स्वस्थ, नैतिक और समरस समाज रचना की दिशा में एक सशक्त वैचारिक मंच के रूप में उभर रहा है। इस संदर्भ में आचार्यकुल पत्रकारिता प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक अधिवक्ता कुमुद रंजन सिंह ने कहा कि समाज के बौद्धिक और नैतिक उत्थान में साहित्यकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, मूल्यबोध और लोकमंगल का संवाहक है। जब समाज दिशाहीनता, हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक संकट से गुजर रहा हो, तब साहित्यकार ही समाज को सही मार्ग दिखाने का कार्य करते हैं।

कुमुद रंजन सिंह के अनुसार, आचार्यकुल की अवधारणा शिक्षा, अध्यात्म, विज्ञान और सामाजिक सरोकारों के समन्वय पर आधारित है। इसमें साहित्यकारों की सहभागिता समाज को वैचारिक रूप से सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्ध होगी। आचार्यकुल ऐसे साहित्य को बढ़ावा देता है जो मानवता, करुणा, सत्य और अहिंसा के मूल्यों को प्रतिष्ठित करे।

उन्होंने यह भी कहा कि आज के युवाओं को साहित्य और वैचारिक विमर्श से जोड़ना समय की आवश्यकता है। साहित्यकार यदि युवा चेतना से संवाद स्थापित करें, तो एक स्वस्थ, जागरूक और उत्तरदायी समाज का निर्माण संभव है।

अंत में उन्होंने विश्वास जताया कि आचार्यकुल अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जैसे आयोजन साहित्यकारों, पत्रकारों और विचारकों को एक साझा मंच प्रदान कर समाज निर्माण की दिशा में ठोस पहल साबित होंगे।

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