
दीप जलाओ तुम इस तरह धरा पर
कि ,कहीं अँधेरा रहने ना पाये ||
ज्ञान का दीप इस तरह जलाओ,
कि मिट जाये अज्ञान धरा से,
करो दूर तुम निराशा मन से,
और जगाओ मन में आशा,
दीप जलाओ तुम इस तरह धरा पर,
कि ,कहीं अँधेरा रहने ना पाये ||
दूर से जलती झिलमिल बाती,
भर देती है ऊर्जा मन में,
देती है संदेश पथिक को,
निकलो -तुम….
इस गहन अँधकार से,
आगे की राह सरल होगी,
और जीवन मुक्त हुआ अँधियारे से,
दीप जलाओ तुम इस तरह धरा पर,
कि ,कहीं अँधेरा रहने ना पाये ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब



