साहित्य

पहचान होती अपने आप ही

ऋतु गर्ग

आजकल बोलती है कलम और
बोलती है दवात भी।
अपनों की पहचान होती है, अपने आप ही।

होते है गुण अवगुण समान ही,
कथनी और करनी में होता अंतर
अपने आप ही।

बोल किसी और के अच्छे लगते नहीं,
बातें अपनी ही सुहाती है
अपने आप ही।

आज जिधर देखो बोलबाला स्वयं का
कौन अपना कौन पराया
पहचान होती अपने आप ही।

पहचान लेते वह चुटकियों के अंदाज से,
लहजे उनके बताते हैं नैतिक साफ़ के
परख होती अपने आप ही।

आजकल स्याही कुछ लिखती नहीं,
कुछ शब्द बदलते रंग अपने आप ही।

ऋतु गर्ग,सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल

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