साहित्य

बोझ नहीं है बेटी

नीलम अग्रवाल रत्न 

दो बेटी जुड़वांँ हुई, माता करे दुलार।
पिता खुशी से बोलता, पूर्ण हुआ परिवार।

सास पुकारे सुन बहू, बेटी का क्या मोल।
बेटा जनती एक तो, बोले कड़वे बोल।।

बेटे से घर रौशनी, कुल का तारण हार।
बेटी से क्या वंँश बढ़े, बेटे से उद्धार।।

दोनों पोती से कहे, तुम हो लड़की जात।
माता सुनती दूर से, लगता दिल आघात।।

कटु वाणी सुन सास की, मन में उठे गुबार।
बेटी ही तो मांँ बने, बहती अंँसुवन धार।।

आज जमाना है नया, गुण बेटी पहचान।
मुझको इनपर नाज है, दोनों मेरी जान।।

खूब पढ़ाऊंँ मैं इन्हें, छिड़कूंँ इनपर जान।
मुझको प्यारी जान से,कहती सीना तान।।

बेटा कुल का दीप है, वंशज तारण हार।
वंश बढ़ाने के लिए, परे जरूरत नार।।

बेटी ही बनती बहू, समझ न इसको भार।
ये ही नव जीवन रचे, तभी बढ़े परिवार।।

चांँद तलक भी जा रही, आज बेटियांँ देख।
हिम्मत से आगे बढ़े, भाग्य बदलती लेख।।

दादी भी पहचान गई, बेटी धन अनमोल।
हीय लगा कर बोलती, उनसे मीठे बोल ।।

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