
जब न आए नाच-गाना,
तब दोष आँगन पर डालना।
काम खुद को हो न करना,
और बहाना रोज़ बनाना।
बुद्धि का हो जो दिवाला,
दोष देता वह तकदीर को।
गलती अपनी न माने कोई,
रस्ता पकड़े वह तीर को।
आलसी की यही निशानी,
दूसरों की मती बिगाड़ना।
हक न हो जब लड़ने का भी,
बिना बात ही ज़िद करना।
हुनर न हो तो मान ले तू,
यही है सच्ची सीख भइया।
झूठे दोष न मढ़ किसी पर,
छोड़ दे यह झूठी दुनिया।
स्वरचित और मौलिक
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश



