
थोड़ी गर्माहट लेकर
थोड़ी ठंडक लेकर
कहीं मन को लुभा रही है तो
कहीं मन को तड़पा रही है ।
आने वाला वक्त..
कड़कती ठंड और
कंबल की गर्माहट न जाने
भावों को ऊष्मा प्रदान कर रही है या
सुप्त अवस्था में लेकर जा रही है।
समय के साथ सिमट जाते हैं जुराबों में स्वेटर और दुशालों में।
अंगीठी की तपन
आजकल सुहाती नहीं
क्योंकि वह आज झुलसाती है
तन और मन को भी।
क्योंकि चूल्हे से निकलता धुआं
राहत नहीं देता
आंखों में खुजली पैदा करता है,
उससे जो सुलगेगी आग़
उससे हाथ गर्म नहीं होते
दिल में जलन पैदा होती है।
आज वह अंगीठी और चूल्हे नहीं है
अपनों का साथ नहीं है
अपने ही जब चाहते हैं
सीढ़ियों पर चढ़ना
तो हाथों में
तालिया की गुनगुनाहट नहीं है,
वह खनखन करती आवाज नहीं है।
ऋतु गर्ग सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल
स्वरचित मौलिक रचना



