साहित्य

भीड़ में भी मन अकेला

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

भीड़ भरी गलियों में चलता, मन का पथ सुनसान लगे,
हँसते चेहरों के मेले में, हृदय कहीं वीरान लगे।
शब्द अनेक हों होंठों पर, मौन भीतर गहराता है,
सबके बीच रहकर भी मन, खुद से ही घबराता है।

रिश्तों की इस चकाचौंध में, अपनापन खो जाता है,
हर मुस्कान के पीछे जैसे, दर्द कहीं सो जाता है।
शोर बहुत है चारों ओर, पर सन्नाटा मन घेर ले,
भीड़ में भी मन अकेला, पीड़ा अपनी फेर ले।

कदम कदम पर साथ सभी, फिर भी दूरी रहती है,
आँखों में जो बात छुपी है, वह अनकही रहती है।
समय की तेज़ रवानी में, भावों का दम घुटता है,
मन का पंछी पिंजरे में, चुपचाप ही सिमटता है।

कभी किसी की एक दृष्टि, आशा दीप जला जाए,
भीड़ के इस अँधेरे में, मन को राह दिखा जाए।
मिल जाए जो सच्चा साथी, तन्हाई मुस्काए,
भीड़ में भी मन अकेला,जब हमसफर को न पाए।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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