
ग़ज़ल
काश मैं ऐसी ग़ज़ल लिख पाऊं
प्यार का जिक्र हो उसमें,
और तुम्हें मैं आज़माऊ!!
दिल तो तुम्हारे भी धड़कता होगा
मैं ऐसा संगीत कहाँ से लाऊं!!
तुम्हारे साथ मरने की मेरी ख़्वाहिश है
मगर इतनी ज़्यादा मै उम्र कहाँ से लाऊं!!
दिलों को जोड़ कर रखना चाहता हूं मैं
यह सुकून दिल को मैं कैसे दिलाऊं!!
तुम मुझे अजनबी नहीं लगते
अपनी यही पहचान मैं कैसे बनाऊं!!
तमन्नाओं का बाज़ार सज चुका है
मैं मोहब्बत का इनाम कहांँ से पाऊं!!
लोग तो कह कर भी मुकर जाते हैं
मैं इतनी क़ाबिलियत कहांँ से लाऊं!!
तुम्हारी ही जुस्तुजू दिल में है
ग़ैर की महफिल में मै कैसे जाऊं!!
काश मैं ऐसी ग़ज़ल लिख पाऊं….
– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान



