
मृगतृष्णा
लम्हा लम्हा बीत गया
जीवन सारा बीत गया!!
प्यार वफ़ा सब रिश्ते नाते
साथ कई का छूट गया!!
बंधन जीवन को मत समझो
बीत गया सो बीत गया!!
आहट जीवन पाने की है
स्वप्न सा जीवन बीत गया!!
वक्त के साथ चले जाना है
हर रिश्ता पीछे छूट गया!!
स्वार्थ से जीवन उबर ना पाया
फिर अपना कोई रूठ गया!!
मृगतृष्णा सा होता जीवन
आंँख का पानी सूख गया!!
रूठा रूठा लगता है अब
दाना पानी उठ गया!!
मिथ्या है यह जीवन सारा
क्षण भंगुर सा रीत गया!!
जीते जीते लगता है अब
समय हमारा बीत गया…..
– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




