
होती नहीं, बराबर सब की–
ये जाड़े की रात सिहरती सिहरती सी।
है दोरंगी दुनियाँ की
क्यों अलग-अलग तस्वीर सी ?
कहीं पे बजती है शहनाई तो,
कहीं तकदीर रुलाती सी ।
किसी को है नर्म रजाई गद्दों की
लगी हुई भरमार सी ।
किसी को बस, फटी गूदड़ी
गर्माहट के लिए तरसाती सी ।
होती नहीं बराबर सब की–
ये जाड़े की रात सिहरती सिहरती सी।
सर..सर..चले सर्द हवाएँ ,
अमीरी- मन की मौज मनाए ।
“पूस की रात” बेदर्द बड़ी,
मजलूमों का खून जमाती सी ।
पूछो बेघर लोगों से क्या गुजरी
होर्डिग अखबारों की चादर में
फुटपाथों पर उनकी ये,
जाड़े की रात ओस बहाती सी ?
होती नहीं बराबर सब की-
ये जाड़े की रात सिहरती सिहराती सी।
मंजुला शरण ‘मनु’



