
लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ
आशियां आकर बसाओ,तन्हा न अब छोड़ जाओ
लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ
कब से है सूना घर मेरा,आकर तुम इसको सजाओ
तड़प रहा तब से मन मेरा,सीने से अपने लगाओ
ऑंखों में छायी उदासी,टूटी सॉंसों को बनाओ
लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ
मेरे साखी हम-दम मेरे, बात मेरी मान जाओ
कुछ नही मैं बिन तुम्हारे, इतना अब तुम जान जाओ
है अधूरी हर कहानी,पूरी उसको तुम कर जाओ
लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ
बिन तुम्हारे साथ साखी,दर्द में जीवन को पाओ
प्रेम की गहराइयों में,उतरें साथ मिलकर आओ
हो तुम ही जीवन भी मेरा,समझों अब लौट आओ
बिना तुम्हारे ‘दर्श’ अधूरा,आओ साखी अपना बनाओ
लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ,लौट आओ
कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’दर्श’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)




