
नदी बहती रही सदियों, चुपचाप अपना दर्द लिए,
किनारों ने ही बाँधे उसको, अपने स्वार्थी पर्दों में।
कल तक जो जीवन देती थी, प्यास बुझाती हर आँगन,
आज वही कराह रही है, कचरे के गहरे घेरों में।
उसकी धारा में सपने थे, खेतों की हरियाली थी,
अब ज़हर घुला लहू-सा, उद्योगों की चालाकी थी।
माँ बनकर जो पाल रही थी, नगर-नगर की संताने,
उसी माँ की छाती पर हमने, खोदीं लालच की खाने।
रेत लूटी, वन उजाड़े, बाँध दिए उसके प्राण,
सूख गए उसके आँचल में, मछलियों के अरमान।
त्योहारों की भीड़ उतारी, पूजा का दिखावा किया,
पर लौटते ही उसके जल को, फिर अपवित्र बना दिया।
नदी पूछे मानव से अब, क्या इतना भी अधिकार नहीं?
जीवन देकर भी क्या मेरा, जीना तुझको स्वीकार नहीं?
कल जब सूख कर मर जाऊँगी, तब पछतावा होगा भारी,
बिन नदी के सूनी धरती, रोएगी मानवता सारी।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




