साहित्य

कसौटी जिंदगी की

सुमन बिष्ट

बहुत कठिन नहीं है जिंदगी की राहों को समझना,
अगर हम सीख लें खुद से भी कभी सवाल करना।
जो कसौटी हमने गढ़ी है, दूसरों को आज़माने की,
कभी उसी कसौटी पर खुद को भी परखना।

हम उँगली उठाते हैं, अपने को आईना में देखे बिना,
दोष गिनाते हैं हम,कोई भी वजह समझे बिना।
हर गलती हमें लगती है बस सामने वाले की,
अपने हिस्से की कुछ गलतियाँ को जाने बिना।

जब अकेले ही सच की धूप में खड़े होंगे हम,
तो अपने कर्मों की परछाइयाँ, दिखेंगी कम।
जो भार दूसरों के कंधों पर,हमें हल्का लगे,
जब वही रखेंगे ख़ुद पर,तो बोझ से दब जाएंगे हम।

कठोर शब्दों का ज़हर हम यूँ ही बाँट देते हैं,
पर ख़ुद को मिले तो, दुनिया को इल्ज़ाम देते है।
ऊँची आवाज़ में,जिस न्याय की करते रहे बातें,
जब खुद कटघरे में खड़े हो उसके, तो बगलें झाँकते हैं।

यदि तौलना है, तो पहले खुद को ही तौलें,
अपने सच–झूठ का पूरा हिसाब किताब लगाएँ।
शायद तब समझ आए, ज़िंदगी इतनी मुश्किल नहीं,
बस तराजू के एक पलड़े पर खुद बैठ जाएँ।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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