
निरंकार वह ज्योति है, जिसमें कोई आकार नहीं।
सब स्वरूप उसी से जन्में, पर उसमें ही विस्तार नहीं।
जगत का मूल सत्ता, जो हर कण-कण में भासित है।
जिसका ज्ञान पल भर में, मन बोझिल निरवासित है।
निरंकार वही जो नभ में, धरा में, हर धड़कन में है।
जिसका रूप न कोई देखा, वही जीवन-मन में है।
जिससे जन्मे रूप हजारों, वह निर्गुण-सा शांत खड़ा।
सत्य अनादि अभंग वही , जिसका प्रकाश सदा अड़ा।
निरंकार की भक्ति दीप, मन का तम हर जाता है।
रूप-रंग सब मिट जाते, बस सत्य ही जगमगाता है।
ना पूजा की कोई रीति, ना मूरत का कोई आकार।
सिमरन से ही खुल जाती, अंतर की हर एक दीवार।
निरंकार की छाया में मन, कितना निर्मल हो जाता है।
सांस-सांस में ईश बसा हो, जीवन धन्य हो जाता है।
जब जग का शोर थम जाता, भीतर शांति उतरती है।
निरंकार की भक्ति में ,हर धड़कन प्रभु को धरती है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार



