साहित्य

नव-वर्ष : एक आत्मिक आवाहन

दया भट्ट दया

ओ समय-सरोवर के नव-कलश!
सपनों की उजली जलधार!
मेरे बीते पलों की थकन
धो ले अपनी मृदुल फुहार।

ओ क्षण-क्षण में जन्मी आशा!
विश्वासों की धूप-सुगंध!
मेरी टूटी अभिलाषाओं को
दे नव अंकुरों का अनुबंध।

ओ मौन-वेद की नई ऋचाएँ!
जीवन-पथ का नव उद्घोष!
मेरे भीतर जो सोया था
कर दे उसको आज प्रकाशोच्छ्वास।

ओ परिवर्तन के रथ-सारथि!
संघर्षों के मौन सूत्र!
मेरी हारों को गूंथ दे
विजय के स्वर्णिम सूत्र।

शुभता के इस नव-अवतरण
तुझको मेरा प्रणाम समर्पित—
ओ नव-वर्ष! मेरी चेतना
तुझे ही आज अर्पित।

*दया भट्ट दया* खटीमा, उधम सिंह नगर (उत्तराखंड)

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