साहित्य

युग पुरुष श्री कृष्ण

शशि कांत श्रीवास्तव

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उस द्वापर युग के कृष्ण की भांति
पुनः लो अवतार इस धरती पर ,
चारो तरफ फैल रहा सम्राज्य
अधर्म का –और धरा से
लुप्त हो रहा है धर्म और संस्कार ,
उस युग में तो एक ही था दुर्योधन
और एक ही था -धृतराष्ट्र ,
पर…,
आज के इस युग में तो हैं -असंख्य
दुर्योधन और धृतराष्ट्र ,
जहाँ…,
कभी होती थी पूजा-धर्म और नारी की
दोनों का है अस्तित्व आज खतरे में ,
तुमने ही तो नींव रखी थी
भारत एक अखंड देश का ,
उसको भी खंडित करने को
आज के ये दुर्योधन ,
तभी तो..,
देश पुकार रहा है तुमको -कि
हे ,माधव मुरली -सुदर्शन धारी
देश और धर्म की रक्षा हेतु
फिर से आ जाओ इस धरा पर ,
और ,
करो -संहार देश के दुर्योधन का
और , बचा लो लाज आज फिर
धर्म और नारी का ,
और , अलख जगा दो लोगों में
प्रेम -प्यार और विश्वास का ,
उस द्वापर युग के कृष्ण की भांति
पुनः लो अवतार इस धरती पर…||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

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