साहित्य

मेरी मां

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

सहनशीलता शब्द है छोटा,जब मां की ममता तौलो,
बाप कभी भावुक हो जाता,पर मां की ममता ने मोलो,
आहत होता मन माई-बाप का, जब पूत अनादर करते ,
मां तो है अभ्यस्त मगर बापू का मुंह न खोलो।।

चीखे और चिल्लाए बापू,पूत को उन्नत करने को,
मां है शांत सरल जलनिधि, उपक्रम सब कुछ सहने को,
गर्भ से लेकर पालन-पोषण तक कितनी ही लात सही इसने
खून से मोह बहुत है मां को, चाहे हरदम संग रहने को।।

साक्षात देवि नारायणी है मां,तिल तिल भर्ती पर उप न करती,
कोख से जन्मे शिशुओं पर,तन अपना सदा ही अर्पण करती
खुद की चाहत, बच्चों के आगे,शून्य में हरदम खो जाती,
सबको खिला पिला कर माता,अन्त में ही भोजन करती।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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