कंपकंपाती ठंड है,
त्रासदी प्रचंड है,
प्राकृतिक ये दंड है,
क्यों तुझे घमंड है?
मानव इधर त्रस्त है,
सरकार उधर मस्त है,
हर इक तंत्र व्यस्त है,
सबको वरदहस्त है।
हम ठंड के ख्यालों में,
वो जाम के प्यालों में,
जनता रहे सवालों में,
डुबे हैं वे घोटालों में।
जिंदगी लिखी किताब है,
कहानी भी लाजबाव है,
गुरबत का जो हिसाब है,
देता कहां कोई जवाब है?
गजब का झारखंड है,
चहुंओर शिलाखंड है,
अविकास का प्रखंड है,
सबकुछ ही तो पाखंड है।
इधर मिट रही जो हस्ती है,
जान भी तो बड़ी सस्ती है,
उधर जारी मटरगस्ती है,
इधर जिंदा जबरदस्ती है।
वो तृप्त भ्रष्टाचार में,
हम तो फंसे उधार में,
घाटा मिला व्यापार में,
क्या देखूं सरकार में।
हर सोच खंड खंड है,
चलते हैं जो मुस्टंड है,
मिला न ‘आशु’ दंड है,
पर झारखंड अखंड है।
*सुबोध झा ‘आशु’*




