
आया आया बसंत, छाया छाया बसंत×2
बाल, वृद्ध,युवा सभी को भाया बसंत।
1- शीत प्रपात से मुरझाई लता को,
जीवन ज्योति मिली कुंज कुंज को,
नवरस नव किसलय में घुलने को,
आतुर है हर पल-पल खिलने को।
आया आया बसंत, छाया छाया बसंत×2
बाल, वृद्ध,युवा सभी को भाया बसंत×2
2- नीलाभ आसमां है,हरिताभ वसुधा है,
पीताम्बर ओढ़े शस्य श्यामला धरा है,
कनक बालियों की कैसी स्वर्णाभ छटा है,
मुकुलित मंजरियों से उपवन सजा है।
आया आया बसंत, छाया छाया बसंत×2
बाल, वृद्ध,युवा, सभी को भाया बसंत
3- गमक उठा फागुन, बयार बह रही है,
फूट रही कोंपल सुगंध उड़ चली है।
हरष रहा तन मन,भावों की लड़ी है,
प्रिय की प्रतीक्षा में प्रीति खड़ी है।
आया आया बसंत, छाया छाया बसंत,
बाल, वृद्ध,युवा सभी को भाया बसंत।
4- बर्फीली चादर से गिरिवर ढका है,
सूर्य के अंतः में सुलगती प्रभा है,
रंग रंगीली चूनर की अनुपम छटा है,
सुषमा प्रकृति की अद्वितीय घटा है।
आया आया बसंत, छाया छाया बसंत,
बाल, वृद्ध,युवा सभी को भाया बसंत।
गीतकार- सुषमा श्रीवास्तव, रुद्रपुर, उत्तराखंड।



