
काफ़िले में दिल अकेला पड़ गया है
बे दिली से साथ चलना पड़ गया है।
ढ़ल चुके हैं शाम के साए शजर से
दश्त को ये भी बताना पड़ गया है।
शाख़ पर अटकी हुई हैं चाहतें जो
लौट आ कह कर बुलाना पड़ गया है।
अजनबी से हैं सभी इक साथ हो कर
एक मंज़िल हैं जताना पड़ गया है।
फ़ासले हैं दरमियाँ कुछ इस क़दर से
बेरहम है वक्त कहना पड़ गया है।
मंजुला शरण “मनु”
राँची,झारखण्ड़।




