साहित्य

गीतिका

वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

महँगाई निस-दिन है बढ़ती,महँगाई मारे।
सरल नहीं जीना लगता है,कहते बेचारे।।

टैक्स कहीं तो शुल्क कहीं है,बहता है पैसा..
यात्रा भी अब कठिन हुई है,जन जन हैं हारे।

भाग रही है चाँदी अब तो, पकड़े अब कैसे..
चमक रहा है सोना भी तो, जैसे हो तारे।

फल सारे अब रत्न हुए हैं,घर की है शोभा..
रोते मध्यम वर्ग सभी जन,नैन अश्रु खारे।

कर तनाव अब दूर सभी के,हिम्मत हरि दे दो..
भव-बाधा सबकी हर लो रे,सुन सबके प्यारे।।

वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.

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