
मैं टूटता हुआ ख़्वाब हूँ, मुझे सहारा दे कोई
उजड़ी हुई सी रूह हूँ, मुझे किनारा दे कोई
थक कर ठहर गई हैं साँसें उम्मीद की डगर में,
डूबते हुए इस दिल को एक इशारा दे कोई
ज़ख़्मों की नुमाइश से अब ऊब चुका हूँ यारों,
मेरे ग़मों को भी थोड़ा सा सलीक़ा दे कोई
हर रोज़ हँस के जीना बस एक हुनर ही तो है,
अंदर जो रो रहा है, उसे नज़ारा दे कोई
भीड़ में हूँ मगर फिर भी तन्हाई नहीं जाती,
इस शोरगुल भरे दिल को भी सन्नाटा दे कोई
मैंने ही सीख ली है ख़ुद को समेट कर जीना,
अब सीख के बदले मुझको बेपरवाही दे कोई
मत पूछो मेरी चाहत किस मोड़ पे आ ठहरी,
बस टूटने से पहले दिल को बहलाता दे कोई
‘दिलकश’ की इस कहानी में बस इतना सा मोड़ हो,
जो खो गया था मुझसे, वही पता दे कोई
दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




