साहित्य

ग़ज़ल

डॉ गीता पाण्डेय "अपराजिता"

परख कर हाथ को थामें, अमन का पल दिखाई दे।
मधुर रिश्ते बने हरदम,न उसमें छल दिखाई दे।।

मुहब्बत की ज़मी पर खूँ, भरा मंजर न फैलाओ,
बनो तुम दर्द के साथी, मुकम्मल हल दिखाई दे।

इमाँ है डोलता अब तो, अमीरों के कदम बहके,
गरीबों के नयन छलके,व्यथा का जल दिखाई दे।

नहीं सोचा कभी मैंने, सियासत से भरी बातें,
सहारे के बिना अब तो,जहाँ दलदल दिखाई दे।

नशा दीवानगी का जब, किसी दिल पे उतर जाता,
जरा सी हो कहीं आहट,फकत हलचल दिखाई दे।

अकेले जंग लड़ती हूँ,कई अपने जगत में हैं,
नहीं है वक्त पर कोई,मुझे संबल दिखाई दे।

नजीरें पेश मत करना कभी गीता जगत में है,
न रक्षित आज है तेरा, न बेहतर कल दिखाई दे।

डॉ गीता पाण्डेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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